22 जवान छत्तीसगढ़ में शहीद होने के बाद नक्सली समस्या और समाधान

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22 जवान छत्तीसगढ़ में शहीद होने के बाद नक्सली समस्या और समाधान

रामचंद्र केरकेट्टा(गोड्डा)

सलवा_जुडूम में आदिवासियों के 650 गाँवो को पुलिस ने जलाये| हजारों महिलाओं से सिपाहियों ने बलात्कार किये| हजारों निर्दोष आदिवासियों को माओवादी कह कर जेलों में ठूंस दिया गया| 12 साल तक की आदिवासी लड़कियों के साथ पुलिस ने बलात्कार उनके स्तनों को और गुप्तांगों को बिजली के तारों से जला कर जेलों में डाला गया| यह सब उजागर किया  गया तब  वर्षा डोंगरे ने लिखा कि उन्होंने भी जेल में ऐसी आदिवासी लडकियां देखी थीं और यह देख कर काँप गई थी|उसके बाद सरकार ने आदिवासियों को न्याय देने और अपराधी पुलिस वालों को सजा देने की बजाय जेलर डोंगरे को ही सस्पेंड कर दिया|

जब आदिवासियों के ऊपर होने वाले सरकारी जुल्मों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गये तो सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडूम को गैर संवैधानिक घोषित किया और छत्तीसगढ़ सरकार को आदेश दिया कि सभी गाँव को बसाओ, दोषी पुलिस वालों के खिलाफ रिपोर्ट लिखो और आदिवासियों को मुआवजा दो| लेकिन  सरकार ने एक भी आदेश नहीं माना| 

भारत के संविधान में आदिवासियों को पांचवी अनुसूची में विशेष अधिकार दिए गये हैं| संविधान ने भारत के राष्ट्रपति को आदिवासियों का संरक्षक नियुक्त किया है| राष्ट्रपति जब चाहे बिना सरकार से पूछे आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए सीधे कार्यवाही कर सकता है| लेकिन चाहे आदिवासियों के साढ़े छह सौ गाँव जला दिए गए हों, चाहे सिपाहियों ने हजारों आदिवासी महिलाओं से बलात्कार किये हों, आज तक राष्ट्रपति ने आदिवासियों के पक्ष में एक बार भी अपने उस अधिकार का प्रयोग नहीं किया| बल्कि जब दंतेवाड़ा के एसपी अंकित गर्ग ने आदिवासी मानवाधिकार कार्यकर्ता सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर भर दिए तब भारत के राष्ट्रपति ने उसे वीरता पुरस्कार दिया और छत्तीसगढ़ शासन ने उसे तरक्की दी।

जहां अन्याय है वहाँ शांति नहीं हो सकती| सिपाहियों की बंदूक के दम पर आप बस्तर में कभी शांति नहीं ला सकते| बस्तर ही क्यों यह दुनिया भर की कहानी है| दुनिया का हर युद्ध शांति के लिए लड़ा जाता है| हम सोचते हैं युद्ध के बाद शांति आ जायेगी| लेकिन ऐसा कभी नहीं होता| आप सोचते हैं आप बस्तर में सीआरपीएफ की कुछ और बटालियन तैनात कर देंगे और उससे शांति आ जायेगी| तो आप गलती पर हैं| माओवाद विकास के गलत माडल, सरकारी जुल्म और अन्याय से बढ़ रहा है| आप न्याय दीजिये शांति आ जायेगी|
लेकिन आपकी सरकारें तो न्याय की बात करने वालों को ही जेल में डालती है|

अगर सरकार सोचती है कि न्याय की मांग करने वाले यह सामाजिक कार्यकर्ता ही सबसे बड़े दुश्मन हैं और इन्हें जेल में डाल दो तो सब समस्या दूर हो जायेगी तो ऐसा करके देख लीजिये|

अगर सरकार सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों से रिहा कर दे| आदिवासी नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से बात करके आदिवासी इलाके में न्याय और विकास के काम करे तो निर्दोष सिपाहियों की मौत रुक सकती है|

जब बस्तर में चालीस उजड़े हुए गाँव को बसाया गया था तब छह महीने तक उस इलाके में एक भी पुलिस वाले को नहीं मारा गया था| यह बात दंतेवाडा के तत्कालीन एसपी राहुल शर्मा से कही गयी थी| लेकिन उनके मन में इस प्रयास का कोई सम्मान नहीं था, उन्होंने में उन्नीस आदिवासियों को लाइन में खड़ा करके गोली से उड़वा दिया|
आज राहुल शर्मा इस दुनिया में नहीं हैं, उन्होंने अपनी रिवाल्वर से खुदको गोली मार ली, इस मामले में सरकार ने मारे गये लोगों को गुपचुप एक एक लाख रूपये दे दिए, मामला आज भी कोर्ट में है,किसी को कोई सजा नहीं मिली, बारह साल गुजर चुके हैं|

जवानों के मारे जाने में सारा और पूरा दोष सरकारों का है|पूंजीपतियों के दलाल जिनके इशारे पर आदिवासियों को उनकी जमीनों से उजाड़ा जा रहा है| आदिवासियों की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में डाला जा रहा है|

खैर सरकारों को सिपाहियों की मौत से कोई फ़र्क नहीं पड़ता| सरकार को तो इन्वेस्टमेंट, पूंजीपतियों की कृपा और उसमें मिलने वाले कमीशन के कम होने से फर्क पड़ता है|

लेकिन किसान के बेटे सिपाही की मौत से दुःख होता है और गहरा फ़र्क पड़ता है इसलिए शांति की सच्ची कोशिश करते रहना और न्याय के लिए अपनी आवाज उठाते रहना जरूरी है।

आदिवासियों को नक्सली बोलने वालो से कुछ सवाल:

1. इन गरीब लोगो के पास इतने आधुनिक हथियार आते कहां से है?
2. हथियार खरीदने का पैसा कौन देता है?
3. इनको ट्रेनिंग कौन देता है और वह कहां से आता हैं?
4. यह लोग सेना पर ही हमला क्यों करते हैं? उस इलाके मे रहने वाले आमजन और नेताओं पर क्यों नहीं?
5. इनको सेना की हलचल का पता कैसे चलता है या का कौन इनको जानकारी उपलब्ध करवाता है?
6.आन्तरिक सुरक्षा के लिये जिम्मेदार लोगों पर ऐसे हमलो के बाद कार्रवाई क्यों नहीं होती है?
7.क्या सुरक्षा एजेंसियां नाकाम साबित हो रही हैं जो इनके मुख्य सरगनाओं का ना तो पता लगा पा रही है ना उनको पकड़ पा रही हैं?
8. नक्सलियों का उदय सिर्फ खनिज सम्पदा वाले इलाको झारखंड छत्तीसगढ़ उड़ीसा मे ही क्यो हो रहे हैं? रेगिस्तान क्षेत्र राजस्थान में क्यों नहीं?

इनके जवाब ढूण्डने की कोशिश कीजिये। या जिम्मेदारो से इनके जवाब मांगना शुरु किजिये। वरना आपस मे आदिवासी-किसान-कबिलाई ही मरते रहेंगे और देश के 1% लोग सत्ता और सेना की आड़ में अपना काम करते रहेंगे।

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Disclaimer: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक रामचंद्र केरकेट्टा के अपने हैं। झारखंड फ्रंटलाइन नक्सलवाद व  हिंसा का समर्थन नहीं करता है।भारत के संविधान पर पूर्ण आस्था रखते हुए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सशक्तिकरण के लिए हम कटिबद्ध हैं।लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा करते हुए शहीद 22 जवानों को झारखंड फ्रंटलाइन श्रद्धांजलि देते हुए नमन करता है।@संपादक

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