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स्नेहा रॉय की ग़ज़ल

 

 

यह किस ने कह दिया दीवार बन के रहना है ।
तेरी कहानी का किरदार बन के रहना है।।

बिखरने दूंगी नहीं काफ़िला मैं जीवन का।
सुलगती रेत में छतनार बनके रहना है।।

किसी का ख़ौफ़ हमें बर्फ़ करने वाला था ।
अब अपने अश्कों को अंगार बन के रहना है।।

तुम्हारा काम है तुम साज़िशें किए जाओ।
हमें हमेशा वफादार बन के रहना है।।

सज़ा किसी का भी दिल तोड़ने की समझोगे।
नज़र में अपनी गुनहगार बन के रहना है।।

कभी- कभी की मैं साहित्य के लिए नहीं हूँ।
मुझे हमेशा लगातार बन के रहना है।।

बस अपने घर में ही छन- छन बाजूंगी मैं स्नेहा।
नहीं है शौक़ के झंकार बन के रहना है ।।

स्नेहा राय,अध्यक्ष,झारखंड हिन्दी साहित्य परिषद
रांची, झारखंड

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